Wednesday, July 04, 2012

Stability .. the Mirage !!

इस धरती पर, जहाँ कुछ भी 
क्षण-भंगुरता के विकार से बचा नहीं है,
यहाँ, मैं बाँवला सा,
स्थापत्य का कभी न पूरा होने वाला स्वप्न देखता हूँ.

स्थ्यापत्य का यह कभी न पूरा होने वाला स्वप्न,
और कभी न पूरे होने वाले न जाने कितने स्वप्नों को जन्म देता है, 
और ...
इसके परिणाम स्वरुप, मैं बाँवला सा
इन सपनो के दलदल में धंसता जाता हूँ.

क्या है खुद को स्थापित करना?
क्या इच्छाओं की पूर्ति स्थ्यापत्य का पथ-प्रदर्शन करती है?
या फिर , क्या दूसरो पर अपना वर्सच्व बनाना
स्थापत्य की राहों में मील का पत्थर होता है?
शायद नहीं, कभी नहीं.
परन्तु फिर क्यों,
स्थ्यापत्य प्राप्त करने के लिए
मैं, बाँवला सा, इन्ही हथकंडो को अपनाता हूँ ,
और बेवजह, स्थ्यापत्य की तलाश में, अपनी नज़रों में गिरता जाता हूँ.

कितने स्वयं को स्थापित कहने वालो को 
शहीद होते हुए देखा है.
कितनी गगन-चुम्बी इमारतों की ..जो की (शायद) अडिग थीं..
नीव हिलते हुए देखी है.
कितने राजा - महाराजाओं को .. जिन्होंने न जाने कैसे कैसे हथकंडे अपना कर, स्वयं को (शायद) स्थापित किया ..
तड़पते, करहाते , लड़खड़ाते हुए देखा है.
उनके स्थापत्य को टूटते हुए, मिट्टी के रंग में मिलते हुए देखा है.

स्थापत्य ,
जो की इतना नश्वर है,
जो की अथाह सदियों से,
स्वयं को ही स्थापित नहीं कर पाया है.
मैं , बाँवला सा, क्यों ऐसे स्थापत्य के पीछे,
आँख मूँद कर भागता हूँ?