Wednesday, April 06, 2005

Socha Maine Jab bhi


सोचा  जब  भी  मैंने  की  लड़  लूं
इस  ज़िन्दगी  के  साथ ,
तो  वोह  हमेशा
मुझसे  दो  कदम  आगे  ही  मिली .

मिल  गया  मुझे  वोह  सब  कुछ
जिसका  होता  है  इस  दुनिया  को  अरमा ,
जो  ना  मिला  तो   सिर्फ  वही
जिसे  मैंने  ढूंडा  शाम  सवेरे  हर  गली -गली .

गुरूर  था  मुझे  की  खेल  रहा  हूँ
मैं  इस  ज़िन्दगी  की  बिसात
जो  आया  सामने  आईना  तो   पाया
मेरी  रूह  थी  एक  शतरंज  के  प्यादे  में  ढली .

हो  गए  ख़त्म सब  ख्वाब
टूट  गयी  हर  रिश्ते -नाते  और  इश्क -मुश्क  की  डोर
पर  शमा  की  वोह  लौ 
जो  एक  बार  भुझी  तो  फिर  कभी  न  जली .

सोचा  जब  भी  मैंने .....

2 comments:

Div Rakesh said...

Cool Man!!!
too Good....
Keep it up...

Vinay Puri said...

Hi kautauk, i happend to see your blog from the comments of RPG's blog.

Good Stuff boy.. aanya..