सोचा जब भी मैंने की लड़ लूं
इस ज़िन्दगी के साथ ,
तो वोह हमेशा
मुझसे दो कदम आगे ही मिली .
मिल गया मुझे वोह सब कुछ
जिसका होता है इस दुनिया को अरमा ,
जो ना मिला तो सिर्फ वही
जिसे मैंने ढूंडा शाम सवेरे हर गली -गली .
गुरूर था मुझे की खेल रहा हूँ
मैं इस ज़िन्दगी की बिसात
जो आया सामने आईना तो पाया
मेरी रूह थी एक शतरंज के प्यादे में ढली .
हो गए ख़त्म सब ख्वाब
टूट गयी हर रिश्ते -नाते और इश्क -मुश्क की डोर
पर शमा की वोह लौ
जो एक बार भुझी तो फिर कभी न जली .
सोचा जब भी मैंने .....
2 comments:
Cool Man!!!
too Good....
Keep it up...
Hi kautauk, i happend to see your blog from the comments of RPG's blog.
Good Stuff boy.. aanya..
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